Friday, May 11, 2018

मयूरासन

मयूर का अर्थ होता है मोर। इस आसन करने से शरीर की आकृति मोर की तरह दिखाई देती है, इसलिए इसका नाम मयूरासन है। इस आसन को बैठकर सावधानीपूर्वक किया जाता है। इस आसन में शरीर का पूरा भार हाथों पर टिका होता है और शरीर हवा में लहराता है।

#दोनों हाथों को दोनों घुटने के बीच रखें। हाथ के अँगूठे और अँगुलियाँ अंदर की ओर रखते हुए हथेली जमीन पर रखें। फिर दोनों हाथ की कोहनियों को नाभि केंद्र के दाएँ-बाएँ अच्छे से जमा लें। पैर उठाते समय दोनों हाथों पर बराबर वजन देकर धीरे-धीरे पैरों को उठाएँ।

हाथ के पंजे और कोहनियों के बल पर धीरे-धीरे सामने की ओर झुकते हुए शरीर को आगे झुकाने के बाद पैरों को धीरे-धीरे सीधा कर दें। पुन: सामान्य स्थिति में आने के लिए पहले पैरों को १जमीन पर ले आएँ और तब पुन: वज्रासन की स्थिति में आ जाएँ।

#जमीन पर पेट के बल लेट जाइए। दोनों पैरों के पंजों को आपस में मिलाइए। दोनों घुटनों के बीच एक हाथ का अंतर रखते हुए दोनों पैरों की एड़ियों को मिलाकर गुदा को एड़ी पर रखिए। फिर दोनों हाथों को घुटनों के अंदर रखिए ताकि दोनों हाथों के बीच चार अंगुल की दूरी रहे। दोनों कोहनियों को आपस में मिला कर नाभि पर ले जाइए। अब पूरे शरीर का वजन कोहनियों पर दें कर घुटनों और पैरों को जमीन से उठाये रखिए। सिर को सीधा रखिए।

#मयूरासन खुली हवादार जगह में करना चाहिए। इसके लिए आप सबसे पहले घुटनों के बल बैठ जाएं और आगे की ओर झुके।

#आगे झुकते हुए दोनों हाथों की कोहनियों को मोड़कर नाभि पर लगाकर जमीन पर सटा लें। इसके बाद अपना संतुलन बनाते हुए घुटनों को धीरे-धीरे सीधा करने की कोशिश करें। अब आपका शरीर पूरी सीध में है और सिर्फ आपके हाथ जमीन से सटे हुए हैं।

#इस आसन को करने के लिए शरीर का संतुलन बनाए रखना जरूरी है जो कि पहली बार में संभव नहीं। यदि आप रोजाना मयूर आसन का अभ्यास करेंगे तो आप निश्चित तौर पर आसानी से इसे कर पाएंगे।

मयूरासन के लाभ

#आमतौर पर #मयूरासन से #गुर्दे, #अग्नाश्य और #आमाशय के साथ ही #यकृत इत्यादि को बहुत लाभ होता है।
#यह आसन #फेफड़ों के लिए बहुत उपयोगी है।इस आसन से #वक्षस्थल, #फेफड़े, #पसलियाँ और #प्लीहा को शक्ति प्राप्त होती है।

#तिल्ली, यकृत, गुर्दे, अग्न्याशय एवं आमाशय सभी लाभान्वित होते है।

#मधुमेह के रोगियों के लिए भी यह आसन लाभकारी है। इस आसन से क्लोम ग्रंथि पर दबाव पड़ने के कारण मधुमेह के रोगियों को भी लाभ मिलता है। इस आसन का अभ्यास करने वालों को मधुमेह रोग नहीं होता। यदि यह हो भी जाए तो दूर हो जाता है।

#चेहरे पर चमक लाने के लिए मयूरासन करना चाहिए। यह आसन चेहरे पर लाली प्रदान करता है तथा उसे सुंदर बनाता है।

#यह आसन शरीर में रक्त संचार को नियमित करता है।

#यह आसन पेट के रोगों जैसे-अफारा, पेट दर्द, कब्ज, वायु विकार और अपच को दूर करता है।

#यह आसन भुजाओं और हाथों को बलवान बनाता है।

#मयूरासन करने से हाथ, पैर व कंधे की मांसपेशियों में मजबूती आती है।

#यदि आपको आंखों संबंधी कोई समस्या है तो उसका निदान भी मयूरासन से किया जा सकता है।

#पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए मयूरासन करना चाहिए। यदि आपको पेट संबंधी समस्याएं जैसे गैस बनना, पेट में दर्द रहना, पेट साफ ना होना इत्यादि होता है तो आपको मयूरासन करना चाहिए। पाचन क्रिया सुचारु रूप से कार्य करती है।

#कब्ज‍ियत, गैस आदि पेट से संबंधित सामान्य रोगों का निदान होता है। जिन लोगों को बहुत अधिक कब्ज रहती है उनके लिए मयूरासन से बढ़िया कोई उपाय नहीं। जठराग्नि को प्रदीप्त करता है।

#सामान्य रोगों के अलावा मयूर आसन से आंतों व अन्य अंगों को मजबूती मिलती है। आँतों एवं उससे संबंधित अंगों को मजबूती मिलती है एवं मयूरासन से आमाशय और मूत्राशय के दोषों से मुक्ति मिलती है।

#यह आसन गर्दन और मेरुदंड के लिए भी लाभदायक है।

#जिन लोगों को ब्लडप्रेशर, टीबी, हृदय रोग, अल्सर और हर्निया रोग की शिकायत हो, वे यह आसन योग चिकित्सक की सलाह के बाद ही करें।

#आमतौर पर मयूरासन उन लोगों को करने के लिए मना किया जाता है जो उच्चे रक्तचाप की समस्या से पीडि़त हैं।

#टी.बी यानी तपेदिक के मरीजों को भी मयूरासन नहीं करना चाहिए।

#हृदय रोग या हार्ट की बीमारियों से ग्रसित लोगों को भी मयूरासन नहीं करना चाहिए। अल्सर और हर्निया रोग से पीड़ित लोगों को भी मयूरासन करने से बचना      

Tuesday, May 8, 2018

बाबा रामदेव से जुड़े 10 प्रमुख तथ्य - योग के जरिए देश- दुनिया में दिलाई 'योग' को पहचान


'योग' पर चर्चा होते ही जो जेहन में सबसे पहला नाम बाबा रामदेव का आता है। इस नाम को भारत में ही नही बल्कि पूरी दुनिया में बखूबी जानते हैं। इन्होंने योग को पुरे विश्व में फैलाकर देश की पूरी दुनिया में अलग पहचान बनाई है। बाबा रामदेव का जन्म 12 दिसम्बर 1965 को हरियाणा जिले के महेन्द्रगढ़ जिले में नारनौल नामक गांव में हुआ था। इनका ब्रांड 'पातंजलि' जिस नाम से इन्होंने स्वदेशी उत्पादों का निर्माण शुरू किया, आज हर प्रकार के उत्पाद बनाती है। रामदेव जगह-जगह स्वयं जाकर योग-शिविरों का आयोजन करते हैं, जिनमें हर सम्प्रदाय के लोग आते हैं। इन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान भी शुरू किया और कभी-कभी तीखे राजनीतिक बयान भी देते रहते हैं। आज हम योग गुरु रामदेव के बारे में कुछ ऐसे तथ्य बता रहे हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं । 


🔶 1875 में लिखी दयानंद सरस्वती की किताब ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का रामदेव पर गहरा असर पड़ा था। सरस्वती के इसी प्रभाव के कारण रामदेव कभी फोन पर हैलो नहीं कहते, इसके बजाय वह ओम कहते हैं। बाबा रामदेव के प्रेरणास्रोत रामप्रसाद बिस्मिल और सुभाष चंद्र बोस भी रहे हैं। इन्‍होंने हिमालय की कंदराओं में भी मेडिटेशन और स्‍व-अनुशासन का अभ्‍यास करते हुए काफी दिन बिताए हैं।

🔶 शुरुआती दिनों में रामदेव योग की छोटी-छोटी क्लासेस देते थे और कई जगह छोटे-छोटे कैंप लगाते थे जिनमें आने वाले लोगों की संख्या मात्र 30 से 40 हुआ करती थी, लेकिन योग से लोगों को फर्क पड़ने लगा तो बाबा ने इसकी फ़ीस रख डाली। लोग बताते हैं कि बाबा उस वक्त फ़ीस के एवज में 30 से 50 रुपया लिया करते थे। बाद में आस्‍था चैनल पर योगा के प्रोग्राम से इन्‍हें लोकप्रियता मिली।

🔶 बाबा रामदेव ने आज भी अपना बजाज कंपनी का 90 के दशक का स्कूटर संभाल कर रखा है। इस स्कूटर पर वह दवाइयां बेचते थे। यह उन्हें आज भी बहुत अजीज है।

🔶 बाबा रामदेव और पतंजलि के सीईओ आचार्य बालकृष्ण आपस में संस्कृत में बातें करते हैं। हालांकि आम जनता के सामने वे हिंदी में ही बोलते हैं।

🔶 रामदेव पूरी तरह से स्वदेशी अपनाने वालों में से हैं। इसकी सलाह वे अन्य लोगों को भी देते हैं। इसलिए वे आज भी महिंद्रा की स्कॉर्पियो से ही आना-जाना करते हैं। फोन भी वे माइक्रोमैक्स का इस्तेमाल करते हैं। यहां तक कि वे भरी गर्मी में भी सोने के लिए AC का इस्‍तेमाल नहीं करते हैं।

🔶 बाबा रामदेव हमेशा फर्श पर ही सोते हैं। हालांकि उनके कमरे में एक वीडियोकॉन का टीवी और पढ़ाई की टेबल जरूर है, लेकिन वे सोने के लिए फर्श का इस्तेमाल करते हैं।

🔶 हर तरह के प्रोडक्‍ट लाने के बाद बाबा रामदेव अब जल्द ही तीन हजार तरह के कपड़ों की वैरायटी बाजार में उतारने वाले हैं।

🔶 बाबा रामदेव रोज 18 से 20 घंटे काम करते हैं। रोज सुबह 3 बजे जगकर ही एक्‍सरसाइज में लग जाते हैं। ये शाकाहारी है और अनाज बिलकुल नहीं खाते बल्कि हमेशा फ्रूट्स का सेवन करते है और जूस का भी अधिक से अधिक सेवन करते है।

🔶 बाबा रामदेव पश्चिमी पकवानों से बहुत ही घृणा करते है और सॉफ्ट ड्रिंक्‍स को टॉयलेट क्लीनर्स बताते है।

🔶 हालांकि बाबा आठवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ कर घर से चले गए थे और योग सीखने लगे थे पर इनके पास चार-चार यूनिवर्सिटीयों से मिली डॉक्‍टरेट की डिग्री है। उन्‍होंने एक बार कहा था कि होमोसेक्‍सुअलिटी एक मानसिक विकार है।

Saturday, April 28, 2018

Great Explorer - Kishan Singh Rawat

Great Explorer Kishan Singh Rawat (1850-1921)


Kishan Singh Rawat also known as “Krishna” code name, was among the great explorer of 19th Century, who explore the forbidden regions of Tibet & Central Asia in the disguise of a merchant & Buddhist Lama. He was famous for last & greatest survey expedition of Darjeeling to Mongolia via Lhasa.
Kishan Singh was born in the village Millam, Pithoragah district of Uttarakhand State of India in the year 1850. His Father Sri. Dev Singh Rawat was a wealthy trader of that time. His brother Man Singh Rawat & Cousin Nain Singh Rawat acompained him in the survey expeditions of Tibet & Central Asia's region. 
In 1862 he joined as a assistant in Dharchula Government School & keep his studies side by side. later he passed certificate examination from Normal School, Almora & become a teacher in Girls School, Milam & Dharchula Government School for 3 years & got the title of "Pundit". 
In 1867 Kishan Singh was recruited as a trainee surveyer by Survey of India, Dehradun & trained by G.B. Hensey with his cousin Nain Singh Rawat. During the two year rigrious training at Survey of India, he learned sevral skills of surveying & use of various scintific instruments. 

Survey Expeditions:

Kailash Mansarover Expedition (1869)
After the training at the Trigonometrical Survey Kishan Singh Rawat went on his first survey of Tibet & explored 400 miles long route from Katai Ghat to Mayapur, of Sitapur district of Uttar Pradesh starting from Kailash Mansarover lake in Tibet. 


Shigache to Lhasa Expedition (1871-72)

On July 1871, Kishan Singh Rawat reached Chunta via Shigatse & went Petinchucha in Tibet. On 13th January 1872 he explore the landscape around Tengri Nor Lake on 14th Febuary he reached Nambdo & explored the region near Bulccho Lake, which was famous for the abundance of  Bauxite in the lake. 
On 18th Febuary he was robbed by the group of 60 armed bandits & there was hardly anything left with him. On 9th April he manages to reach Lahsa in hope of getting some help. By mortgaging his survey instruments, he got some rupees & manages to reach Dehradun sucessfully after all the adverse & diffcult circumstances faced by him.  
During this expeditions he surveyed 320 miles long route from Tengri Nor Lake to Lahsa.

Douglas Forsyth's second Yarkand to Kashgar  Expedition (1873-74)




On July 1873 Sir Douglas Forsyth joined Kishan Singh Rawat on his Yarkand-Kashgar expedition but he was asked to return on the way via Khotan to survey travel routes of Ladakh. After survey of this route Yarkand to Khotan & Noh, Kishan Singh planned to go further to Rudok, but stopped by the officials of border posts. 
In this expedition Kishan Singh surved 1250 Miles long travel route from Tankse to Yarkand-Kashgar-Khotan-Tibet & then towards Leh via Noh & Pongong Lake. 


Darjeeling-Lhasa-Mongolia Expedition (1878-82)




Darjeeling-Lhasa-Mongolia expedition was the most famous, adventurous & historic expedition of Kishan Singh Rawat. On 24th April 1878 he started his fourth & last & expedition with Chhumbel & Gangaram of Darjeeling. 
On 5th September 1878 he reached Lhasa after a long journey & stayed a year in the disguise of a trader. Kishan Singh surved the geography of the region & learned Mongolian language & made friendship with Mongolian traders of Lhasa. 
On 17th September 1879 joined the group of Mongolian traders for his journey to Mongolia. After a week, they reached the Changthang plateau.
When Kishan Singh was preparing for his further journey to Sachu, a border post in Chinese kingdom, Gangaram some of his money along with two horses & a binocular and ran away.     
On 8th January 1881 with the help of some Lamas Kishan Singh finally reached Sachu, which was dominated by the Han Chinese population. Due to suspicious nature of these locals he found it impossible to travel further to north & secretly surved the chinese town for about 7 months. In August he travelled to Thoden Gompa, A Buddhist monastery & stayed for 2 months. 
On his return journey Kishan Singh used his intelligence & skills to befriend many locals traders & piligrims in order to reach India. On 12th November 1882, Darjeeling after more than 4 years & 6 months since start of his expeditions & travelled about 2800 miles of distance on foot & explored such vast & unknown regions of central Asia, which were never mapped by any geographer. 

For his distinguished service & extraordinary achivements the British Indian Government granted him a Jagir in Sitapur district.   

Kishan Singh Rawat was a great explorer, geographer & cartographer of 19th century, who made his significaint contribution to the geography of Asia.  

Monday, February 13, 2017

उत्तराखण्ड में भी अनुच्छेद-370 के समान कोई कठोर कानून होना चाहिये ?

सवेंदन शील हिमालय को मानवीय गतिविधियों और हस्तक्षेप से बचाना है ? शायद इसका उत्तर है अनुच्छेद-370 या फिर इसी तरह का और कोई कठोर कानून की। यहां बात हो रही है उत्तराखंड राज्य की, अपनी प्राकृतिक सुषमा के लिए जानें जाना वाला उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी जैसे नयनाभिराम दृश्य भी हैं, लेकिन इस प्राकृतिक संपदा का उपयोग सरकार और तमाम माफियों नें अपनें व्यापारिक हितों के लिए जमकर किया। आये दिन नई-नई विद्युत परियोजनाओं को कमजोर और सवेंदनशील पहाड पर थोपा जा रहा हैं, वही सदानिरा नदियों के सतत प्रवाह को रोककर उनके जल को भी प्रदूषित किया जा रहा है,गंगा जैसी पवित्र नदी को बॉधों में डालकर उसकी शाश्वत पवित्रता को खतरे में डाला जा रहा है, वहीं राज्य भर की नदियों से लेकर गाढ-गधेरों में खनन माफिया चॉदी काट रहे हैं खनन से जहॉ नदियो के किनारे बसे नगरं-बस्तियों को खतरा उत्पन्न हो रहा वहीं लगभग सभी नदियों के तटों पर स्थित उपजाऊ खेती के विनाश को खुला आमंत्रण दिया जा रहा है। यहां यह बात करना चाहूंगा कि इस सबके बाद अगर बात अनुच्छेद-370 इस सबके बाद अगर बा की करू तो कोई बात होगी या नही। अगर इस बात बात होती है तो उत्तराखण्ड को भी एक शेर है बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी और अगर यही बात किसी ऐसे शख्स के श्रीमुख से निकली हो, जो देश के राजनीतिक क्षितिज पर एक बहुत बडा सितारा हो, तब वह कितनी दूर जायेगी इसे खुद ही समझा जा सकता है।

यहां जम्मू-कश्मीर राज्य पर अनुच्छेद-370 प्रासांगिकता पर टिप्पणी करनें के बजाय, उसकी जो सबसे खास बात, जो आकर्षित करती है वह है राज्य में बाहरी लोगों का राज्य में बसनें पर पूर्ण प्रतिबंध, बाहरी नागरिकराज्य की जमीन पर न तो मकान अथवा भवन ही बना सकते हैं न ही किसी प्रकार से जमीन की खरीद फरोख्त ही, इसके अतिरिक्त इस कानून में तमाम ऐसे प्रावधान भी हैं जो इस पहाडी राज्य की जैव विविधता और नैसर्गिक संपदा को सुरक्षा प्रदान करते हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर राज्य आज भी धरती का स्वर्ग बना हुआ है। ये भी सच्चाई है कि इसी कानून की बदौलत संभवतया जम्मू कश्मीर रियासत को यह तमगा नसीब हुआ है, वरना भारतीय धनकुबेरों की यहॉ कई-कई अट्टालिकाऐं खडी हुई मिलती जो निश्चित रूप से यहॉ की खुबसुरती को तो धब्बा लगाते ही, साथ ही तमाम तरह के प्रदूषणों के साथ यहॉ की आवो-हव्वा में जहर घोलनें का काम करते। बहुत संभव है कि इस राज्य की कुदरती खुबसुरती की सलामती के लिए उसे अनुच्छेद-370 की के दायरे में लाया गया हो ?1947 में जम्मू-कश्मीर रियासत के तत्कालीन शासक हरि सिंह और भारत सरकार के बीच सहमति के हुई थी,सहमति पर राजा हरिसिंह नें दस्तखत किये हैं, बाद में 1952 में राजा हरि सिंह की इसी भावना को ध्यान में रखते समझौता किया गया, और 1974 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गॉधी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री (हरि सिंह द्वारा नियुक्त) शेख अब्दुल्ला के बीच हुई सहमति द्वाराभी इस विचार की पुष्टि हुई। हालंाकि राज्य पर अनुच्छेद-370 के प्रावधान पर देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियो,बुद्विजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के भिन्न-भिन्न मत,विचार और तर्क हैं, लेकिन भारत राष्ट्र की ्यअनेकता में एकता्य वाली विशेषता को ध्यान में रखते हुए, इस राज्य पर इस अनुच्छेद से ज्यादा असहज भी नहीं है, क्योंकि देश को आजाद हुए छरू दशक से उपर हो गये,ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिससे अनुच्छेद-370 से कोई समस्या पैदा हुई हो,सिवाय राजनीतिकों के बयानों और भाषणों के।यह देश बहुभाषी, बहुधर्मी,विभिन्न मत-मतान्तरों व अलग-अलग भौगोलिक पृष्टभूमी के चलते कुछ राज्यों के विकास को गति प्रदान करनें के लिए कुछ नये स्थानों के लिए नये ढंग से प्रावधानों को गढना आवश्यक है। अनुच्छेद-370 जैसा एक और अनुच्छेद-371 भी है, जो पूर्वोत्तर के कई राज्यों पर लागू है, तथापि समय-समय पर राज्यों के विधान मंडल और देश की संसद देश और राज्यों के लिए नये कानूनों और प्रावधानों का निर्माण करते रहते है।

दरअसल इस बहानें हम उत्तराखण्ड राज्य की चर्चा करना चाह रहें हैं अभी हाल में ही आई प्राकृतिक आपदा नें हिमालयी वाशिंदों और देश वासियों को जो संदेश दिया उस अर्लाम को समझना निहायत ही जरूरी हो गया है,इसीलिए इस राज्य को भी अनुच्छेद-370 जैसी की बाध्यता की आवश्यकता महसूस हो रही है। हालांकि इस अनुच्छेद में कई ऐसे प्रावधान हैं,जिन पर कई लोंगो को आपत्ति हो सकती है,यह नितांत राजनीति मुद्दा भी है,इसलिए स्पष्ट कर देंना जरूरी है कि उत्तराखण्ड राज्य पर अनुच्छेद-370 थोपनें जैसी किसी बात की हिमायत नही हो रही, अपितू जरूरत इस बात कि महसूस की जा रही है कि ऐसा कोई कठोर प्रावधान बनें,जिससे यहॉ कि प्राकृतिक संपदा पर मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो,या इस गुंजाइश को पूर्णतया समाप्त किया जाना चाहिए,कि यहॉ कि प्राकृतिक संपदा को किसी भी प्रकार का कोई अनावश्यक दबाव न झेलना पडे,पिछले कई वर्षों का इतिहास बताता है कि राज्य की प्राकृतिक संपदा पर बडे से बडे व्यापारियों, ठेकेदारों,दलालों बिचोलियो और वन माफियो की नजर रही है, हद तो तब हो गई जब सरकारों नें ही इशारों ही इशारों में इस राज्य की प्राकृतिक संपदा को लुटनें की खुली इजाजत दे दी,चिपको आन्दोलन इसी नीति की परिणति था, जब जबरन वन माफियों को जंगलो में घूसनें की छूट खुद सरकारयनें दी, तब प्रतिकार स्वरूप महिलाओं ने पेडों पर चिपक कर उसका जमकर विरोध किया तब जाकर उन्होंनें पेडों को बचाया। लेकिन आखिर सवाल उठता है कि राज्य की जनता कब तक सडकों पर आंदोलन रत रहेगी ? खासकर तब जब स्वंय सरकार पहाड के बेटे-बेटियों के हाथों में हैं ? लेकिन 16 वर्ष के उत्तराखण्ड को राजनीतिको नें सिवाय राजनीतिक महत्वाकंाक्षा का शिकार बनाया। इससे दुरूखद और क्या हो सकता है,कि पहाड टूटता,दरकता रहा और यहॉ का राजनीतिक वर्ग मैदानों में पलायन करता रहा, राज्य के तमाम बडे नेता जो कभी पहाड की जवानी और पानी को रोकनें की वकालत करते हुए चुनाव जीता करते थे,राज्य बननें के बाद पहले ही पलायन कर गये।

इस राज्य को भी भगवान नें जम्मू और कश्मीर जैसी कुदरती खुबसूरती से नवाजा है। लेकिन इसके संरक्षण और रख-रखाव के लिए अनुच्छेद-370 जैसा कोई प्रावधान न तो पहले बना नही राज्य के अस्तित्व के बाद बना। नतीजन प्राकृतिक संसाधनों की लूट की परंपरा आज भी जीवित है जिससे राजनेता,अफसर और ठेकेदारों और माफियों की पौ-बारह है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 65 फीसदी भाग वनाच्छादित है,सिवाय जल राशि के रूप मेंकई प्रमुख नदियों का उद्गम स्थलों की भरमार है,मिलम,पिंडारी कफनी गंगोत्री व खतलिंग आदि महत्वपूर्ण ग्लेशियर इसी क्षेत्र में पडते हैं,हिमालय में कुल 238 ग्लेशियर हैं, तथा हिमालय के सबसे बडे ग्लेशियरों में से गंगोत्री ग्लेशियर (4,120 मी0 से लेकर,7000 मी0 की ऊॅचाई पर स्थित है, 30 किलोमीटर लम्बा और 02 से 04 किमी चैडा है।) एक है। इन्हीं से गंगा, यमुना और काली नदियॉ निकलती है। उत्तराखण्ड में वर्तमान में 6 राष्ट्रीय पार्क और 6 वन्य जीव विहार हैं। अपनी प्राकृतिक सुषमा के लिए जानें जाना वाला उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी जैसे नयनाभिराम दृश्य भी हैं, लेकिन इस प्राकृतिक संपदा का उपयोग सरकार और तमाम माफियों नें अपनें व्यापारिक हितों के लिए जमकर किया। आये दिन नई-नई विद्युत परियोजनाओं को कमजोर और सवेंदनशील पहाड पर थोपा जा रहा हैं, वही सदानिरा नदियों के सतत प्रवाह को रोककर उनके जल को भी प्रदूषित किया जा रहा है,गंगा जैसी पवित्र नदी को बॉधों में डालकर उसकी शाश्वत पवित्रता को खतरे में डाला जा रहा है, वहीं राज्य भर की नदियों से लेकर गाढ-गधेरों में खनन माफिया चॉदी काट रहे हैं खनन से जहॉ नदियो के किनारे बसे नगरं-बस्तियों को खतरा उत्पन्न हो रहा वहीं लगभग सभी नदियों के तटों पर स्थित उपजाऊ खेती के विनाश को खुला आमंत्रण दिया जा रहा है।
  
अभी हाल में ही हरिद्वार में छापे के दौरान जो तथ्य सामनें आये वे चैंका देंनें वाले हैं,पाया गया कि क्षेत्र से करीब 400 ट्रकों में रेत-बजरी पडोसी राज्य उत्तर प्रदेश को जाता है,राज्य की एंटी मांइनिंग फोर्स नें हरिद्वार के श्यामपुर क्षेत्र में खनिज संपदा की लुट में शामिल वन विभाग और पुलिस कर्मियों की मिली भगत का भंडाफोड किया, इससे भी दूर्भाग्यपुर्ण और क्या हो सकता है,कि प्रकुति की इस सौगात को लुटनें में राज्य का हर सरकारी कर्मी लिप्त है,छापे के दौरान वन विभाग की कटेबड चैकी में कर्मचारियों के बिस्तरों के नीचे से 84,000 रू0 नगद प्राप्त हुए,यानें प्रकृति के खजानें को लुटनें में कोई भी पीछे नहीं है। इन्हीं नदियों पर अपनें चहेतों को बडी-छोटी विद्युत परियोजनाओं की बंदर बॉट की परम्परा भी समय-समय पर मुखर हो जाती है,इसी क्रम में कई बडी जल-विद्युत परियोजनाओं को पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध के आगे झुकना पडा नतीजन आधी-अधुरे काम के बाद उन्हें अब खंण्डर कर छोड दिया गया है,जबकि निर्माण के दौरान डायनामाइड जैसे विस्फोटको से बडे-बडे पहाडों को छलनी कर दिया गया था, आज हालात ये हैं कि थोडी सी बारिश पर भूस्खलन से बडे-से-बडे पहाड दरकनें लग जाते हैं, जो समय-समय पर बडी से बडी आपदा के साथ जन-धनकी हानि करते हैं। नरकोटा-सिरोबगड के मध्य लगभग 12 किमी के दायरे में डेंजर जोंन लगातार बढते हुए जा रहा है,लगभग एक दर्जन स्थानों पर बारिश के बाद बोल्डरों के गिरनें का सिलसिला बना हुआ है। इस समय राज्य की नदियों पर300 से उपर बिजली परियोजनाऐं प्रस्तावित हैं।

भारतीय वन सर्वेक्षण के ऑकडों के अनुसार राज्य में 2001 में सामान्य सघन वनों का क्षेत्रफल 19,023 वर्ग किमी था। जबकि 2011 में यह 14167 वर्ग किमी रह गया। हाल ही में एक सर्वेक्षण के बाद जी0एस0आई0 नें जनपद रूद्रप्रयाग,चमोली,उत्तरकाशी, पिथौरागढ और बागेश्वर जिलों में 21 विशेषज्ञ अधिकारियों के माध्यम से भूगर्भीय और भू-स्थायित्व के बारे में अध्ययन किया के बारे में अध्ययन किया गया । इस दौरान 274 स्थान ऐसे चिन्हित किये गये जो भू स्खलन की दृष्टि से खतरनाक हैं, 1,000 किमी सर्वेक्षण लम्बे क्षेत्र का सर्वेक्षण कार्य किया गया,जिसमें 67 प्रभावित ग्राम-कस्बों और अवस्थापना संबंधी भूवैज्ञानिक ऑकडे तैयार किये। झहिमालय विश्व की सबसे ऊॅची और सबसे युवा पर्वत श्रृखंला है, भूगर्भीय हलचलों के कारण हिमालय हर साल लगभग 5 मिमी0 ऊॅचा हो जाता है। मध्य हिमालय में बसे नवोदित राज्य उत्तराखण्ड प्राकृतिक और भौगोलिक दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील है, लगातार मानवीय हस्तक्षेप और मानवीय गतिविधियों से यहॉ निरंतर प्राकृतिक दूर्घटनाओं का क्रम जारी है हाल में राज्य में आई प्राकृतिक आपदा नें पूरे देश के जनमानस को हिला कर रख दिया, अकेले रूदप्रयाग जिले कि बात करें जहॉ केदारनाथ धाम स्थित है, तो वहॉ इस जल प्रलय नें इस क्षेत्र को तबाह कर दिया जिले में 649 लोंगों की मौत हुई,देश भर के विभिन्न राज्योंसे केदारनाथ यात्रा पर आये 3,218 तीर्थयात्री लापता हुए जिन्हें अब तक मृतक घोषित किया जा रहा है। इसके अलावा तीर्थाटन और पर्यटन व्यवसाय पूरी तरह चैपट हो चुका है,380 से ज्यादा मकान पूरी तरह धराशाही हो गये, करीब 800 मकानों को गंभीर व आंशिक क्षति पहुॅची,रूद्रप्रयाग जिले में 18 पुल ध्वस्त हुए, जिनका निर्माण तक नही हुआ,लोग ट्राली के सहारे जीवन गुजार रहे हैं। वहीं पूरी आपदा के दौरान कुल मरनें वालों का ऑकडा 4032 है, किन्तु माना जा रहा है कि जिस आपदा नें हर तरफ तबाही मचाई उसके चलतें यह ऑकडा दस हजार से कहीं अधिक भी हो सकता है,ग्लेशियरों से अवतरित होंनें वाली इन नदियों नें निचली घटियों में मानव बस्तियों को ही उजाड दिया। इस त्रासदी नें 22 हजार से अधिक परिवार प्रभावित हुए,तो 12,000 हैक्टे0 से अधिक कृषि भूमी तबाह हुई। हेम गंगा पर बना 200 साल पुराना पुलना-भ्यूॅडार पर भी टूटा रौद्र रूप लेकर आगे बढी, हें गंगा नें इस गॉव की खुशियों को अपनें साथ बहाते हुए 101 परिवारों को बेघर कर दिया। पर्यटन को ठीक ढंग से उभरनें के लिए 5 साल का वक्त लगनें का अनुमान है, पर्यटन विशेषज्ञ प्रो0 टी0के0 आचार्य के अनुसार अगले पॉच सालों में करीब 4 से 5 हजार करोड की राशि पर्यटन व्यवसाय को खडा करनें में लगेंगें।हे0न0ब0 गढवाल विश्वविद्यालय के भूगर्भ वैज्ञाानिकों का दावा है कि यह त्रासदी नें पिछले 600 सालों को भी पीछे छोड दिया है,अलकनंदा नदी में 11 बार बाढ आई जिसमें 2013 की बाढ को सर्वाधिक विनाशकारी मापा गया है,जब अलकनंदा का जल स्तर 4 मी0 से भी उपर पहॅुच गया।

Friday, February 10, 2017

MNC's a menace to India economy

Those who advocates new technology & additional investments & promote exports, Foreign Direct Investment (FDI) by multinational companies (MNC) never shares their technology to the country and adverse impact in our domestic industries, technical capacities. Higher profits earned by these foreign firms goes out of country. 

The Indian rural market, which is flooded with MNC products, should be ful of indigenous produts. This will provide a good health to India economy & also generate greater employment opportunities. Indeginious products will certainly increase additional income, higher purchasing power & will also check urban migration. Implimentation of infrastruture & employment programmes in Indian rural areas for promotion of traditional crafts & foreign exchange earnings. 

Indigenous brands should be encouraged by the government because they gives hope, income, employment & pride to Indian farmers who had lost hope of making a decent livelihood due to cheating with the prices of their products by middlemen and corrupt bureaucrats in the government itself. As indigenous products of all categories are affordable to the common man & they have been testified to be of quality by the people of India. Indian compaines has employed lakhs of people through direct and indirect employment. 




As an example of Patanjali Products which has has uplifted the image of ayurveda in the minds of the people in India as well as abroad. The trust that Indian farmers can produce quality and useful products has been restored in the minds of the people.




Patanjali Ayurveda has started only with 100 farmers, 100 employees and 10 crores capital, is worth over Rs. 5000 crores, but today this indigenous company provides direct employment to over one lakh Indian farmers in north India who grow and supply the raw materials required to manufacture products. This company is slowly spreading its wings in south India through its employees and plans to woo the farmers of south India by providing more than ten thousand direct jobs and fifteen thousand indirect jobs.

MNCS come in India with their established brand names & huge advertising budgets. The advertising budget advantage will certainly be very important for items of mass consumption (FMCGs). The Indian consumer are very price conscious & MNCs use to  produce inferior products at high cost in the country.  




Market dominance by the MNCs makes hard for the indegenious companies. As big supermarkets take out a big margin of the local stores. The MNCs commonly have the power of monopoly which generates them a excess profit. Giant multinaitionals uses the economics of quantity pushing local firms out from their business.
For the sake of profit these global MNCs commonly contribute in pollution & also manufacture non-renewable resourses which are threat for the envirinment & mankind. 

Wednesday, February 4, 2015

 ईमानदारी

कोई कितना भी भ्रष्ट हो, मिलावटखोर हो, कितना भी कामचोर हो पर उसे ईमानदारी, सत्य ही अच्छा क्यों लगता है, लगता है यही प्राकृतिक गुण हैं जो हम जन्मजात लेकर इस दुनिया में लेकर आये थे, बाकी तो सब इस दुनिया में ही आ कर सीखते हैं, क्यों दोस्तों जरा मनन करे और बतायें, क्या यह सत्य है?